वंदना

*जय श्री राधे कृष्णाय नमः* 
दृश्य मनोहर मनोहारी बना मुरारी
 हे वंशीधर करूं चरण वंदना तुम्हारी। 
 मधुर ध्वनि से मोहक छवि से
  मोह लिया जग सारा  प्रेम से । 
गोप ग्वाल ‌ संग कुंज गली में 
 भाव प्रेम का भरते रहे तुम। 
 शीश सजे मोर मुकुट मनोहर 
  मुरली अधर विराजे ।  

शांति प्रेम धुन बाजे जग में
 राधे युगल छवि मनभावन । 
 जो देखे वो ही तेरा हो जाता 
भोर हुए तुझमें मन रम जाता ।  
गीता ज्ञान दे सखा पार्थ को, 
 जीवन मंत्र दिया सारे जग को।  
बहुरूप धारी हो वंशीधर तुम 
 गीता में शब्द रूप धर विराजे तुम । 
 सुध बुध खो देती देख युगलछवि तेरी
नि:शब्द हो जाती देख कृपा तेरी। 
शब्द कहां से लाऊं जो वर्णित करुं
कृपा तुम्हारी जो मिली जगत को ।
 जिसने जिस रुप में पुकारा प्रेम से ,
पशु हो या मानव  तुम दौड़े चले आते। 
अपने भक्तों के प्रेम और ज्ञान का 
मान सदा धरते मोहन कृष्ण कन्हैया।  
दीनो के नाथ हो दीनानाथ, 
कर जोड़ विनती करूं तिहारी।  
अब कृपा दृष्टि हम पर बना,  
अपनी शरण ले लो हे नाथ। 
 स्वरचित मौलिक 
@सुधा त्रिपाठी शुक्ला ✍️ 
मुंबई २५/२/२०२१

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