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राष्ट्र ध्वज

दिन- बुधवार दिनांक- २०/१/२०२१ विधा - छंदमुक्त ‌अतुकांत   *राष्ट्र ध्वज शान हमारी पहचान हमारी* केसरिया,श्वेत,हरी तीन रंगो से रंगा तिरंगा  वीरता, शांति और हरीतिमा का द्योतक  मध्य सजा नील चक्र है समय का द्योतक  ये राष्ट्र ध्वज शान हमारी पहचान हमारी। चक्र की चौबीस तीलियां         चौबीस घंटों की द्योतक। जीवन अपना बांट दिया ,                    इन घंटों में हर भारतवासी ने। देश हित कुर्बान किया,                जीवन वीर जवानों ने । नहीं गिने घंटे कभी,                 देश के कर्णधारों ने।  तब जाकर फहराया तिरंगा            लाल किले की  प्राचीर पर। है राष्ट्र ध्वज शान हमारी पहचान हमारी। स्वरचित मौलिक रचना @सुधा त्रिपाठी शुक्ला✍️ मुंबई महाराष्ट्र २०/१/२०२१

पुष्प

 फूल सदा मुस्काते हैं , मुस्कुराना ही सिखाते हैं  मुरझाने के बाद फिर से खिल जाते हैं  जब तक वे डाल पर लगे रहते हैं  प्यारे परिवार की सही परिभाषा  फूलों से सजी बगिया बताती है। अनेक रंग के फूलों से सजा बाग  घर जैसा ही होता है जहां  अनेंक रंग से रंगे व्यक्तित्व को , मां पिता  अपने प्रेम और संस्कारों से संवारते सींचते बगिया परिवार की । कुछ फूल खिलकर बाग का मान बढ़ाते हैं सब उसको ही निहारते हैं बार बार  और  लगातार  ....... बगिया में लगा गुलाब सबको भाता है  कितने कांटों के बीच रहकर,  अपनी सुंदरता को वो बचाता है  और लोग उसे तोड़ लेते हैं,। इस पर भी वो इतराता है ,अपनी खुशबू पर गेंदे के मध्य हार में उसे पिरोया जाता है और सूखे हार से निकाल कर भी उसे सहेजते है लोग प्रेम वश प्रसाद मान पुस्तकों में सजाते हैं एक गुलाब सौंदर्य तो होता बाग का पर परिवार नहीं।....... अनेंक भावों से सजा परिवार कई रंगों से सजा बाग सादगी और संजीदगी दोनों को बढ़ाता है।  इस बगिया की हकदार नहीं  मैं कोई माली नहीं , धन्यवाद प्रभु का और प्रिय बहन का,...

वंदना

*जय श्री राधे कृष्णाय नमः*  दृश्य मनोहर मनोहारी बना मुरारी  हे वंशीधर करूं चरण वंदना तुम्हारी।   मधुर ध्वनि से मोहक छवि से   मोह लिया जग सारा  प्रेम से ।  गोप ग्वाल ‌ संग कुंज गली में   भाव प्रेम का भरते रहे तुम।   शीश सजे मोर मुकुट मनोहर    मुरली अधर विराजे ।   शांति प्रेम धुन बाजे जग में  राधे युगल छवि मनभावन ।   जो देखे वो ही तेरा हो जाता  भोर हुए तुझमें मन रम जाता ।   गीता ज्ञान दे सखा पार्थ को,   जीवन मंत्र दिया सारे जग को।   बहुरूप धारी हो वंशीधर तुम   गीता में शब्द रूप धर विराजे तुम ।   सुध बुध खो देती देख युगलछवि तेरी नि:शब्द हो जाती देख कृपा तेरी।  शब्द कहां से लाऊं जो वर्णित करुं कृपा तुम्हारी जो मिली जगत को ।  जिसने जिस रुप में पुकारा प्रेम से , पशु हो या मानव  तुम दौड़े चले आते।  अपने भक्तों के प्रेम और ज्ञान का  मान सदा धरते मोहन कृष्ण कन्हैया।   दीनो के नाथ हो दीनानाथ,  कर जोड़ विनती कर...

जीवन

जीवन हौसले का नाम है हौसला किसी एक का नहीं  खुशियां किसी एक की नहीं जीते जीते हम सीखते हैं  यही बड़ी भूल करते हैं । प्रेम सबके लिए सदा के लिए है।  प्रभु के साथ जुड़ा है नाता कई जन्मों से। हम भटक जाते हैं दुनिया की चकाचौंध में । खो देते हैं अहम् रिश्तों को, कोमल अहसासों को आभासी दुनिया में विचरण करते करते । सत्य से कब दूर हो गए हम               पता ही नहीं चला। #स्वरचितमौलिकरचना  @सुधा त्रिपाठी शुक्ला ✍️ १४/२/२०२१